तुम मेरी कविता में आओ

तुम मेरी कविता में आओ
शायद इसको ढंग मिले
तुम मेरी कविता में आओ
सादे कागज को रंग मिले

तुम मेरे व्यवहार में आओ
अधिकार नहीं, प्यार में आओ
तुम जब मेरी हार में आओ,
वो भी बनके मलंग , मिले

तुम मेरे दिवसों में आओ
बहो मुझमें , नसों में आओ
नीरसता में ; रसों में आओ
तब ही तो फिर उमंग मिले

तुम मेरे अभिप्राय में आओ
सही गलत के न्याय में आओ
आओ उनमें, जो सच झूट की,
है संकरी गलियां , तंंग . मिलें.

तुम मेरे अतीत में आओ,
जो ना मानी , उस रीत में आओ
तुम मेरे संगीत में आओ
तब इसको मृदंग मिले

तुम मेरे अपनों में आओ
इस मन के सदनों में आओ
तुम मेरे सपनो में आओ
फिर फिर इन्हे पतंग मिले.

तुम मेरे अभिनय में आओ
निर्मोही इस भय में आओ
समय मिले फिर ह्रदय में आओ
बिसरा मुझको अंग मिले.
---- सालगिरह मुबारक हो Himani Kumar

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