हिंदी मीडियम
धानी बेटा
कल मातृभाषा दिवस था. यह लेख कल ही लिखना था, पर काम में काफी व्यस्त होने के कारण , काल करे सो आज कर हो गया. मैं कई दिनों से सोच रहा था की भाषा के विषय में एक लेख लिखूं. आज वो दिन है.
मेरी शुरूआती पढाई लिखाई एक हिंदी मीडियम विद्यालय से हुई. कक्षा २ तक मैंने अंग्रेजी के नाम पर "ऐ फॉर एप्पल और बी फॉर बैट" ही सीखा था. घर में भी बिलकुल देसी माहौल रहा. मेरी दादी और माँ से मैं मारवाड़ी में बात करता , बाकी हम ५ भाई बहन आपस में हिंदी का ही प्रयोग करते. भोजपुरी की थोड़ी बहुत समझ बिहार में रहने के कारण स्वाभाविक थी. पर भोजपुरी या अन्य बिहारी भाषाएँ बोलने में जुबान तंग थी. उन दिनों ( आज भी)अंग्रेजी में बात करना, लिखना बड़ा ही सम्मान दिलाता था. यहाँ तक की अंग्रेजी मीडियम विद्यालय में पढ़ना भी बड़ी बात थी। किसी तरह जुगत लगा के , माँ ने मेरा दाखिला एक अंग्रेजी विद्यालय में कक्षा ३ में करा दिया।
उसके बाद मेरी अंग्रेजी की गाड़ी आगे बढ़ी. नए विद्यालय में सब अंग्रेजी में ही बात करते . दूसरे विषय भी अंग्रेजी में ही पढ़ाये जाते थे. मुझे भी अंग्रेजी अच्छी लगी. अंग्रेजी व्याकरण , वाक्य संरचना वगैरा मुझे बड़े अच्छे लगते थे. किन्तु भावनाओं को अंग्रेजी में व्यक्त करने में काफी कठिनाई होती थी. मैंने बचपन से कवितायेँ लिखना शुरू कर दिया था. कवितायेँ लिखने का जो मज़ा मुझे हिंदी में आता , वो अंग्रेजी में नदारद था. हिंदी भाषा से एक अजीब सा प्रेम पनपने लगा.
थोड़ा बड़ा हुआ , तो कॉमिक्स पढ़ने का शौक़ चढ़ा. यहाँ भी हिंदी सर चढ़ के बोली. सुपर कमांडो ध्रुव और नागराज , सुपरमैन और स्पाइडर मैन पे बहुत भारी रहे. राज कॉमिक्स ने मार्वल को पछाड़ दिया, और चम्पक ने टिनटिन को. मेरा हिंदी प्रेम जारी था. अंग्रेजी से एक कामकाजी दोस्ती बनी रही. अंग्रेजी भाषण और वाद विवाद प्रतियोगिताएं के माध्यम से, एक संपर्क बना रहा.
लड़कपन में कदम रखा, तो एक अलग तरह के प्रेम अंकुर भी फूटने लगे. कविताओं में प्रेम रस हावी होने लगा. इसे व्यक्त करने का प्रयास ज्यादातर हिंदी माध्यम से हुआ , पर कभी कभी अंग्रेजी ने ज्यादा साथ दिया. उस समय एक अजीब सी बात हुई. जब भी बात को कविता में कहना हो, हिंदी में बात बह निकली. पर अगर कुछ लेख , पत्र या डायरी लिखनी हो, तो अंग्रेजी में ज्यादा सुविधा महसूस हुई. जीवन में पहली बार लगा की एक म्यान में दो तलवारें हो सकती हैं. यह अपने आप में एक बहुत महत्वपूर्ण बात थी. शायद ये पहली बार था जब मैंने जाना की हमेशा एक ध्रुव को चुनना जरुरी नहीं होता.
दसवीं के बोर्ड में अंग्रेजी में डिस्टिंक्शन मिला. अंग्रेजी भाषा ने भविष्य के लिए तमाम विकल्प खोल दिए थे. तो देखा जाये , पढाई और काम काज में अंग्रेजी जिगरी यार रही, पर जब भी बात दिल की आती , हिंदी से पहला प्रेम नहीं भुला. गाने हमेशा हिंदी ही आत्मा तक पहुंचे, और अब हिंदी के साथ साथ हिंदुस्तानी ( उर्दू + हिंदी) भी लुभाने लगी. उर्दू की नज़ाकत, सुंदरता और गहरायी ने काफी जगह बनायीं मेरी डायरी के पन्नो में.
उसके बाद बंगाल , तमिलनाड , आंध्र, इन जगहों पे रहने के कारण यहाँ की सुन्दर भाषाओ से परिचय हुआ. पिछले ६ सालो से मुंबई में हूँ। मराठी समझने में बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं होती, क्या ही अच्छा होता की मैं अपनी कर्मभूमि की भाषा बोल भी पाता। शायद कुछ और सालो में.
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ऊपर लिखी बातें मेरी भाषा जीवनी लग सकती हैं. इन्हे तुमसे बताने का एक विशेष कारण है. जब तुम बड़ी होगी , तुम देखोगी की हमेशा तुम्हे एक ध्रुव चुनने को कहा जायेगा. उम्मीद ज्यादा यह है की अंग्रेजी के सामने हिंदी और स्थानीय भाषाएँ निम्न और कमतर लगें. हम सब भीड़ में चलना चाहते हैं. भीड़ से हमें सुरक्षित महसूस होता है, कोई बुराई नहीं है भीड़ में चलने में, पर उस भीड़ में चलके भी , तुम अपना सच खुद चुनना. अपनी नानी दादी से उस भाषा में बात करना जिनमें तुम उनसे जुडी हो. न अपने आप को , न किसी और को हीन समझना अगर उसे अंग्रेजी ( या अन्य कोई भी भाषा ) नहीं आती. अपनी भावनाओ को उस भाषा में लिखना और कहना जो सीधे तुम्हारे दिल से आती हो. और कोई जरुरी नहीं की हमेशा एक ही भाषा हो. किसी नयी जगह जाना तो वहां के संस्कार, भाषाओ को समझने का प्रयास करना. तुम देखोगी की अंत में सब भाषाएँ प्यार , ज्ञान और मानवीय जुड़ाव की डोर हैं. कोई किसी से न कम है न ज्यादा.
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